Monday, April 20, 2026
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अशोक जीवतोड़े कैसे दिखे मुनगंटीवार के मंच पर? क्या है इसके मायने?

कल दिनांक 7 मार्च 2024 को चंद्रपुर के प्रियदर्शनी सभागृह में महाराष्ट्र के सांस्कृतिक विभाग द्वारा एक शासकीय कार्यक्रम के माध्यम से छत्रपति संभाजी महाराज की जीवनी पर आधारित डाक टिकट का तथा शिवाजी महाराज के दुर्लभ पत्रों के संकलन का अनावरण किया गया। साथ ही ब्रेल लिपि में शिवाजी महाराज की जीवनी भी प्रकाशित की गई। कार्यक्रम की संकल्पना को लोगों ने जितना सराहा, उतना ही लोग आश्चर्य चकित होकर मंच पर बैठे मेहमानों को देख रहे थे। सुधीर भाऊ मुनगंटीवार वार के शासकीय कार्यक्रमों में भी भाजपा के पदाधिकारी का बैठना अब आम बात हो गई है मगर इस बार एक ऐसा चेहरा दिखाई दिया जिसने वहां उपस्थित पत्रकारों के लिए तथा जनता के लिए 100 प्रश्न खड़े कर दिए। यह चेहरा था अशोक जीवतोड़े का। हालांकि अशोक जीवतोड़े इन दोनों भाजपा में ही है मगर उन्हें आज तक अमूमन सुधीर मुनगंटीवार के या हंसराज अहीर के कार्यक्रमों में मंच साझा करते हुए देखा नहीं गया। साथ ही कार्यक्रम की पत्रिका में उनका नाम भी नहीं था।

अब जबकि लोकसभा चुनाव के लिए नामो की घोषणा होना शुरू हो गई है और किसी भी वक्त चंद्रपुर से भी सभी पार्टियों अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित कर सकती है। इस दौरान अशोक जीवतोड़े ने भी लोकसभा की सीट मिलने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। ऐसे में उनका सुधीर मुनगंटीवार के मंच पर दिखाई देना और सुधीर मुनगंटीवार द्वारा कार्यक्रम के बाद उनके पास जाकर विशेष बातचीत करना एक बड़ा संकेत देता है।

एक और जहां कांग्रेस में टिकट को लेकर वेडेट्टीवार और धानोरकर के बीच दो फाड़ नजर आ रहा है, वही मुनगंटीवार और अहीर के विवाद में तीसरे की लॉटरी लगती है क्या? यह चर्चा का विषय बना हुआ है।

पिछली बार हंसराज अहीर सवा 5 लाख वोट लेकर केवल 40000 के अंतर से कांग्रेसी प्रत्याशी दिवंगत बालू धानोरकर से हार गए थे। उनके हार के पीछे सारे कांग्रेसियों का एक होना, सारे कुनबियों का एक होना और सारे भाजपा विरोधियों का एक होना जहां महत्वपूर्ण बात थी, वहीं मुनगंटीवार ग्रुप द्वारा सपोर्ट ना करना भी अहीर की हार का कारण माना जाता है।

मगर अब स्थितियां एकदम साफ नजर आ रही है और कई सर्वेक्षण में भाजपा की चंद्रपुर सीट पर जीत निश्चित मानी जा रही है क्योंकि चर्चा है की धानोरकर को सीट मिलने पर वेडेट्टीवार फिर से पुरानी गलती नहीं दोहराएंगे, जब उन्होंने बालू धानोरकर को जीतने में मदद की थी और उसके बाद बालू धानोरकर उन पर हावी हो गए थे।

मुनगंटीवार पहले ही बोल चुके हैं कि उन्हें दिल्ली जाने में की इच्छा नहीं है। ऐसे में क्या वे अशोक जीवतोडे को साथ देंगे? क्योंकि अशोक जीवतोड़े कुनबी तथा ओबीसी समाज का एक चेहरा है। हालांकि यह चित्र कुछ ही दिनों में साफ हो जाएगा मगर मुनगंटीवार के मंच पर खुद को पकर निश्चित रूप से अशोक जीवतोड़े जरूर खुश होंगे।

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