Sunday, April 19, 2026
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जोर्गेवार भाजपा प्रवेश में मुनगंटीवार, अहीर, जोर्गेवार और कार्यकर्ता – किसकी जीत किसकी हार?

*एक विश्लेषण!*

आखिरकार कल चंद्रपुर के विद्यमान विधायक किशोर जोर्गेवार के भाजपा प्रवेश के साथ और देर शाम कांग्रेस के बचे उम्मीदवारों की नाम के घोषणा के साथ चंद्रपुर जिले के विधानसभा क्षेत्र की चुनावी तस्वीर साफ हो गई। मगर इस दौरान उम्मीदवारों को लेकर जिस तरह का घमासान मचा हुआ था तो लग रहा था जैसे यह भी एक जंग समान है और चुनावी नतीजे जितनी ही लोगों की जिज्ञासा इस ओर बनी हुई थी। क्योंकि टिकट देने में भी और रोकने में भी बड़े-बड़े दिग्गजों ने अपनी प्रतिष्ठा दाव पर लगा रखी थी। अब जबकि सब कुछ साफ हो चुका है तो इस दौरान किसकी जीत हुई और किसकी हार यह भी एक विश्लेषण का विषय बन चुका है। वैसे यह लड़ाई अभी आधी ही दूरी तक पहुंची है और इसका असली निष्कर्ष चुनावी नतीजे के बाद ही निकाला जा सकता है। मगर हमने अपने वाचकों के लिए अब तक का विश्लेषण सामने लाने की कोशिश की है तो आईए देखते हैं टिकट देने तक की लड़ाई में किसकी जीत हुई है और किसकी हार?

भाजपा के दिग्गज और वरिष्ठ नेता माने जाने वाले महाराष्ट्र राज्य के कैबिनेट मंत्री तथा बल्लारपुर विधानसभा के विधायक सुधीर मुनगंटीवार का एक छत्र राज पिछले कई सालों से खतरे में और सवालों के घेरे में आ चुका है। इसलिए समय-समय पर उनके द्वारा राजनीति के बड़े दाव खेलते हुए देखने मिले हैं। ज्यादा पीछे न जाते हुए 2019 के लोकसभा चुनाव में अगर हम झांककर देखें तो उस वक्त मुनगंटीवार राज्य के सबसे सशक्त नेताओं में से एक बन चुके थे। जिसका खतरा खुद उस वक्त के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को भी महसूस हो रहा था जिस वजह से उनके पर छाटने के लिए पार्टी के अंदरुनी कई नेता काम कर रहे थे ऐसी चर्चा थी। इसीलिए सुधीर मुनगंटीवार ने उस वक्त अपनी ही गली के दूसरे बड़े नेता हंसराज अहीर को हराने का काम किया ऐसा इल्जाम उन पर लगता है। इसके बाद समय-समय पर अहीर ने भी इसका भुगतान चुकाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 2024 के चुनाव में हाई कमान की इच्छा अनुसार मुनगंटीवार को लोकसभा चुनाव लड़ना पड़ा और इसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा। अपेक्षा अनुसार उन्हें अहीर की ओर से इस चुनाव में साथ नहीं मिला और अंततः उन्हें अपने एक समय के शिष्य और वर्तमान प्रतिद्वंदी विधायक किशोर जोर्गेवार का समर्थन मांगना पड़ा जबकि वह भी काम में नहीं आया। क्योंकि 2014 में जोर्गेवार की भाजपा विधायक की टिकट काटने में उनका हाथ माना जाता था। इसलिए मनगंटीवार कभी भी जोर्गेवार को भाजपा में वापस लाकर अपने ही नेतृत्व को चुनौती नहीं देना चाहते थे। वही पिछली बार अपक्ष विधायक बनकर शिंदे – भाजपा सरकार को समर्थन देने वाले जोर्गेवार को इस बार किसी न किसी पार्टी से लड़ने की जरूर दिखाई दे रही थी जिसके लिए उनकी पहली पसंद भाजपा थी। मगर भाजपा में विरोध को देखते हुए उन्होंने कांग्रेस और राष्ट्रवादी से भी बातचीत की मगर उन्हें वहां भी विरोध का सामना करना पड़ा। अंततः हंसराज अहीर, बावनकूड़े और देवेंद्र फडणवीस की मदद से उन्होंने एक बार फिर हाई कमान तक टिकट की बात की इसके बाद चंद्रपुर के भाजपा कार्यकर्ता और सुधीर मुनगंटीवार खुलकर विरोध में सामने आ गए। यहां तक की मुनगंटीवार ने मीडिया को इस बारे में बयान भी दिए। मगर शहर में भाजपा में दूसरी पंक्ति के नेता सक्षम नहीं होने की वजह से और हंसराज अहीर जैसे नेता जोर्गेवार के समर्थन में होने की वजह से जोर्गेवार का पलड़ा भारी पड़ा और जोर्गेवार का भाजपा प्रवेश निश्चित हुआ। मगर इस प्रवेश में साफ तौर पर कहा गया की यह प्रवेश सुधीर मुनगंटीवार के नेतृत्व में ही होगा। हुआ भी ऐसा ही तथा पक्ष प्रवेश के उपलक्ष में आयोजित पत्रकार परिषद में मुनगंटीवार ने जोर्गेवार को मंच पर एक शब्द भी बोलने का मौका ना देते हुए अपना वर्चस्व साबित करने की पूरी कोशिश की। और खुद उन्होंने जोर्गेवार को भाजपा का दुपट्टा पहनाकर भाजपा में प्रवेश करवाया तथा 2 घंटे में जोरगेवार की भाजपा उम्मीदवारी घोषित करने की बात कही।

अब अगर इसमें सुधीर मुनगंटीवार के हार जीत की बात की जाए तो उनकी इच्छा के विरुद्ध जोरगेवार का भाजपा प्रवेश उनकी हार मान जा सकता है मगर चुकी यह प्रवेश उनके नेतृत्व में हुआ इसलिए यह उनकी जीत भी मानी जा सकती है।

अगर हंसराज अहीर की बात करें तो आज हर कोई उन्हीं की चर्चा कर रहा है और जोर्गेवार के प्रवेश के लिए उन्हें सबसे बड़ा सूत्रधार मान रहा है जिस वजह से यह उनकी शत प्रतिशत जीत है ऐसा कहा जा सकता है।

बात अगर जोर्गेवार की करें तो 80000 की लीड के साथ अपक्ष उम्मीदवार के रूप में 2019 में विधायक बनने के बावजूद, गुवाहाटी का चक्कर लगाकर आने के बावजूद, मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के करीबी होने के बावजूद उन्हें प्रवेश के लिए दर-दर भटकना पड़ा और आखिर में अपने प्रतिद्वंदी सुधीर मुनगंटीवार के नेतृत्व में भाजपा में प्रवेश लेना पड़ा कुछ लोग इसे उनकी हार बता रहे हैं। वहीं कुछ लोग इसे उनकी समय सूचकता बताते हुए उनकी बहुत बड़ी जीत बता रहे हैं क्योंकि अगर वह चुनकर आ जाते हैं तो निश्चित तौर पर जिले और राज्य में उनका कद बहुत बढ़ जाएगा जो की मुनगंटीवार के लिए आगे सरदर्द साबित हो सकता है।

कार्यकर्ताओं की बात कर तो बृजभूषण पाजारे जैसे कार्यकर्ता अब राजकीय पार्टियों में संभलकर कार्य करेंगे क्योंकि यह किसी की भी जीत या हार होगी मगर निश्चित तौर पर कार्यकर्ताओं की बहुत बड़ी हार है क्योंकि उन्हें समय-समय पर नेता के आदेश पर अलग-अलग झंडा हाथ में पकड़ना पड़ता है और अलग-अलग भूमिकाएं लेनी पड़ती है। आखिर में दो बड़े नेता एक हो जाते हैं और कार्यकर्ता को कोई नहीं पूछता।

बात अगर जनता की की जाए तो आज की राजनीतिक परिस्थितियों में जनता की केवल और केवल हार या फिर बहुत बड़ी हार है क्योंकि पिछले कुछ सालों से जो राजनीतिक परिस्थितिया राज्य में तथा देश में बनाई गई है उससे जनता का अब लोकतंत्र में विश्वास रह पाना मुश्किल हो गया है क्योंकि अब कौन नेता किस वादे पर कौन सी पार्टी से चुनकर आएगा और बाद में कौन सी पार्टी में शामिल हो जाएगा या फिर पुरी की पूरी पार्टी लेकर चला जाएगा इस पर जनता को कोई विश्वास नहीं है। इसलिए यह किसी और के लिए जीत का विषय हो सकता है मगर जनता और लोकतंत्र के लिए यह हार और केवल हार का ही विषय है।

आपको हमारा यह लेख कैसा लगा कमेंट करके जरूर बताएं।

राजेश नायडू,

मुख्य संपादक

पार्थशर समाचार

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